और इसी मे खो गया


चलो तुम्हारे जाने से कुछ काम तो सर हो गया

गम मे तेरे इतना रोये , सहरा गुलिस्ताँ हो गया ।

नीयत थी साफ मेरी बर्फ के पिघले पानी की तरह

शामिल इसमे,  तेरी नज़र का रंग भी तो हो गया ।

यूं निकला मैं तेरे ख्यालों मे खोकर आज

पथरों मे गुम होकर ज्यों साफ पानी हो गया ।

दिल की धड़कन जो सुनाई देती थी,  एहसास से

जर की आँधी मे अब वो भी गुम हो गया ।

शायर के एहसास थे ये, शायरी मे रह गए

‘आलोक’ फिर जहां मे निकला और इसी मे खो गया ।

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