गुरूर था….


कल तक देख मुझे कितना गुरूर था,

लाखों मे एक मैं तेरी आँख का शुरूर था।

तुम मुझे देखकर यूं मुस्करा दिये,

तेरे  दिल मे भी कुछ न कुछ तो जरूर था।

मन किया पूंछू उससे हाल दिल का भी,

पर वो अपनी दौलत के नशे मे मगरूर था।

चाहा की चाहूँ न मैं उसे इतना भी,

पर ‘चाह’ भी दिल के हाथों मजबूर था।

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