ख्वाबों मे भी मैंने ख्वाब टूटते देखे


कैसे कहूँ कि मुझे तेरा इंतज़ार नहीं,

पर तेरे वादे पर भी तो एतबार नहीं।

शराब होती तो कब कि मैं छोड़ देता,

नज़र जो पिलाए उसपे तो इख्तियार नहीं।

ईमान बेचकर जिस्म कि प्यास बुझा ली उसने,

क्या करे यही चलन है, कोई गुनाह नहीं।

मोहब्बत मे हमें मिलेगी कुछ तो रुसवाई,

यह कैसे हो कि चले हवा और उड़े खाक नहीं।

ख्वाबों मे भी मैंने ख्वाब टूटते देखे,

‘चाह’ एक तुम हो जो अब भी बेक़रार नहीं।

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1 Comment (+add yours?)

  1. alok verma
    Jan 09, 2012 @ 09:57:24

    Where you are, New York?

    Reply

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