मेरी जबान और भी है…


एक बस तू ही नहीं, हमसे खफा और भी हैं,
अभी तुमने सुनी कहाँ, मेरी जबान और भी है।

ये ज़ख्म-ए-जिस्म हैं जो तुमको दिखते हैं,
इनके सिवा तेरे सितमों के निशां और भी हैं।

मौत आकर भी अब तेरा कुछ न कर पाएगी,
एक जिस्म ही नहीं, रूहों के मका और भी हैं।

“चाह” दिन भर बैठे इश्क़ की बात करते हो,
इसके सिवा तेरे पास काम-ए-जहां और भी हैं।

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