Gurudwara Sahib Budha Johad: Shri Ganganagar


Grudwara Sahib, Budha Johar in Shri Ganganagar district is sacred place. As per the history told by the Granthi in Gurudwara, this place played a sacred role in giving shelter to Sikh fighter against the atrocities of inavaders during the 17th Century. Bhai Balaka Singh,brought the bad news of the occupation of Harminder Sahib by Massa Rangad Singh. Massa Rangad Singh used the sacred place inappropriate pruposes which led to the journey of Mahitab Singh and Sukha Singh to Harminder Sahib. They cut the head of Massa Rangad and brought it to this place. This place has been named after Jathedaar Budha Singh who stayed here.

Below are some photographs depicting this part of history available in the Museum at the Gurudwara.
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The following is the reproduction of the pamphlet regarding the history of Gurudwara Budha Johar Sahib being distributed in the Gurudwara itself-
यह स्थान राजस्थान प्रांत के जिला श्रीगंगानगर की रायसिंहनगर तहसील के गाँव डाबला के कोई एक किलोमीटर की दूरी पर करनी जी नहर के किनारे पर है। शहीद नगर गुरुद्वारा बूढ़ा जोहड़ के साथ सिख इतिहास का संबंध 17 वी शताब्दी की शुरुआत से जुड़ता है i बूढ़ा जोहड़ का अर्थ है पुराना छपर यहा 20 मुरब्बे नीची जगह है जहा बरसात के मोसम मे कई मिलो तक का पानी नीचे की तरफ चलता हुआ इकट्ठा हो जाता हैi
बाबा बंदा सिंह बहादुर की शहादत के बाद मुगल हुकूमत ने पंजाब के सिखों पर जुल्म जबर की हद कर दी फुर्खसिअर बादशाह ने हुकुम जारी किया कि जहा भी कोई सिख मिले उसे कत्ल कर दोi सिखो के सिरों की कीमत डालने लगीi उस जुल्म जबर के दोर मे हुकूमत ने सिखो को पंजाब से अपने घर बार छोडकर दूर दराज के इलाको पर जाने के लिए मजबूर कर दियाi
सन 1731 ई॰ मे नादर शाह ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया यहा से बेशुमार दौलत लूटी और पंजाब से होते हुए अफगनिसथान को लॉट रहा था सिखो ने उस के काफिलो पर हमले कर के बहुत सारा माल और बहुत सारी नोजवान लड़कियो को उन के काफिलो से मुक्त करवाकर उन के घर वापिस पहुंचाया। नादर शाह इस बात से बहुत क्रोधित हुआ और जक्रिया खान को सिखो का नामो निशान मिटाने का हुकम दिया सिखो के विरूध लाहोर से जकरिया खान ने को सिखो का नामो निशान मिटाने का हुकम दिया। सिखो के विरुद्ध लाहोर से जकरिया खान ने फोज भेजी माझे से नवाब जकरियाखान से सताए हुये दुआबे से आदिन बेग फोजदार जालंदर मालवे से सूबा सरहद के जुल्मो का शिकार हुये सिख विपदा के समय अपने घर बार छोड़ के राजस्थान की बीकानेर रियासत के मरुस्थल वीरान जंगल मे आ गये इस जगह पर पानी काफी तादाद मे था यहा पर ही डेरे लगा लिए क्यूकि जकारिया खान ने सिखो के खात्मा के लिये अमृतसर के चोधरिया और सरकारी मुखबीनों को सिखो के विरुद्ध पूरी तरह तेयार किया हुआ था जदयाले गुरु के हरी भगत नीरजनिए मंडियाली का मस्सा रगर, करमा छीना, रामा रंधावा, नोशहरे वाले जोध नगरिया मजीठा के चोधरिया ने इस काम मे सरकार की पूरी मदद कीi
इस जुल्म के दोर मे सिखो की एक ज्त्थेदारी ने शहीद नगर गुरुद्वारा बूढ़ा जोहड़ वाले इस स्थान को अपनी रिहायशगह बनाया हुआ था उस समय यह स्थान बिलकुल उजाड़ जंगल बियावन था जिसमे जहरीले सापो की भयानक फूंकरो का शोर रहता था i
सन 1740 ई० मे इस स्थान पर सिखो के एक के जत्थे ने जत्थेदार बूढ़ा सिंहजी जेत्थेदारी मे डेरा लगाया था उस समय भाई बलाका सिंह नाम के सिख ने डेरा लगाया हुआ था उस समय भाई बलाका सिंह नाम डीएस सिक्ख ने खबर दी कि सिखों के पंजाब छोडने के बाद मांडयाली गाँव के मस्सा रंगड़ ने श्री हरमंदिर साहिब पर कब्जा कर लिया है वहाँ शराब के दौर चलते है कंजरियों के नाच होते है गुरु घर की घोर बेअदबी हो रही है ।
भाई बलाका सिंह से दुखदायी खबर सुन के इकट्ठे हुए सारे सिख जोश मे आ गए समय की नजाकत को देखते हुए जत्थेदार बुढ़ा सिंह की इच्छा और हाजिर के फैसले अनुसार दो सुरमे महिताब सिंह मीरा कोट और सूखा सिंह माड़ी कंबोकी ने श्री हरमदिर साहिब अमृतसर की पवित्रता को बहाल करने का बीड़ा उठाया और मस्सा रंगड़ का सिर काट कर बुढ़ा जोहड़ लाने के लिए अरदास की। अरदास के बाद दोनों सूरवीर घोड़ो पर सवार हो कर अमृतसर को चल दिये ।
इतिहास मे ज़िकर मिलता है ये दोनों सुरमे बुढ़ा जोहड़ से चलकर श्रीदमदमा साहिब तलवंडी साहिब पहुंचे और अपनी सफलता की अरदास के लिए दमदमा साहिब मे हाजिर हुए तो उस समय दशम पातशाह की बाणी के बारे मे विवाद चल रहा था । सिक्खो का एक समूह दशम पातशाह की बाणी को अलग अलग पोथियों मे रहने देना चाहते थे । सूखा सिंह और महिताब सिंह की अरदास के समय यह फ़ैसला हुआ कि अगर सूखा सिंह और महिताब सिंह दुष्ट मस्सा रंगड़ का सिर काट कर उसका सिर सही सलामत बुढ़ा जोहड़वापिस पहुँच जाते है तो दशम पातशाह की सारी बाणी को एक जिल्द मे एकत्रित कर दशम पातशाह का स्वरूप तैयार किया जाएगा अगर वो इस कम मे सफल न हो सके तो दशम पातशाह की बाणी को अलग अलग पोथियों मे ही रहने दिया जाएगा । गुरु की मेहर का सदका भाई महिताब सिंह और सूखा सिंह अपने उद्देश्य मे सफल हो गए मस्सा रंगड़ का सिर काट कर बुढ़ा जोहड़ लाया गया इस तरह दशम पातशाह कि बाणी के बारे मे छिड़े विवाद का अंत हुआ ।
भाई सूखा सिंह महिताब सिंह ने तरंतारण के नजदीक पहुँच कर चौधरियों के वेश बना लिए अपने गाँव का मामला भरने के बहाने से ठीकरियों को कि थैलियो मे भर ली जब दोनों सिक्ख अमृतसर पहुंचे तो पहले ही तैयार योजना अनुसार उन्होने घोड़े अकाल बुंगे के सामने इलायची बेरी से बांध दिये और अरदास कर के दोनों सुरमे हरमंदिर साहिब पहुंचे तो मस्सा रंगड़ अपनी लुच्च मंडली के साथ हरमंदिर साहिब मे खाट पर बैठा हुक्का पी रहा था । कंजरिया नाच रही थी और शराब का दौर चल रहा थे । जब उसको कहा गया कि चौधरी मामला भरने आए है तो उन्हे थैलिया पेश करने का हुकम दिया थैलिया पेश होने पर मस्सा रंगड़ उठ कर उन्हे देखने लगा तो भाई महिताब सिंह ने फुर्ती से अपने श्री साहिब का वार कर उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया सूखा सिंह ने पलक झपकते ही मस्सा रंगड़ के कटे सिर को अपने भाले पर टांग लिया वहाँ अफरा तफरी मच गई वहाँ इकटठा सारी लुच्च मंडली भाग गई दोनों सुरमे भाले पर टंगे सिर को लेकर फुर्ती से अपने अपने घोड़ो पर सवार होकर अमृतसर की सीमा को पार कर गए ये दोनों सुरमे अपनी की हुई अरदास को पूरा करते हुए वापिस बुढ़ा जोहड़ को चल दिये रात हनुमानगढ़ शहर के पास काटी यहाँ से चल कर सूखा सिंह और महिताब सिंह बुढ़ा जोहड़ बाबा बुढ़ा सिंह के जत्थो के सिक्खो के पास आ पहुंचे और मस्सा रंगड़ का कटा हुआ सिर वहाँ एकत्रित खालसा दल के दीवान मे पेश किया इस कार्य की सफलता के लिए शुक़राने की अरदास की गई ।
कुछ समय बाद महिताब सिंह जी बुढ़ा जोहड़ से वापिस अमृतसर जाते समय किसी मुखबिर की सूचना पर पकड़े गए और लाहौर मे बहुत तसीहें देकर शहीद कर दिए गए।
स. बंदासिंह बहादर की शहादत के बाद 17वीं सदी की शुरुआत मे मुगल हकूमत के ज़ुलम जबर से बचने के लिए और विपदा का समय टालने के लिए दल खालसा के सिख इस बूढ़ा जोहड़ के स्थान पर कुछ समय के लिए आ गए जिस कारण इस स्थान का सिख इतिहास मे महत्वपूरण संबंध है । जत्थेदार बुढ़ा सिंह के नाम पर इस स्थान का नाम बुढ़ा जोहड़ रखा गया । सन 1947 तक बुढ़ा जोहड़ की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया पंजाबी आबादी की गिनती काफी हो गई सारा इलाका और हरा भरा हो गया ।
शहीद नगर गुरुद्वारा साहिब बुढ़ा जोहड़ की नीव सन 1953 मे संत फतह सिंह जी द्वारा रखी गई कुछ कच्चे मकान और पानी की डिग्गी 1954 मे बनाई गई गुरुद्वारे और लंगर का खर्चा चलाने के लिए 2 मुरब्बे जमीन खरीदी गई ।
27 फरवरी 1956 को गुरुद्वारा साहिब की पक्की ईमारत का कम शुरू हुआ इस काम मे हरनाम सिंह ठेकेदार ने बहुत योगदान दिया । इलाके के श्र श्रदालुओ ने अपने ट्रैकटर , ईंटों , सीमेंट और हाथो से सेवा करके अधिक सा अधिक योगदान दिया । गुरुद्वारा साहिब के मेन हाल की लंबाई चौड़ाई तकरीबन 124×99 है । हाल मे एक ही समय मे हजारो की तादाद मे श्रद्धालुओ के बैठने का खुला प्रबंध है । इस के अलावा एक बहुत बड़ा दीवान हाल है । जिस मे अमावस्या पर दीवान लगता है गुरुद्वारा साहिब के अंदर निर्मल जल का एक सुंदर सरोवर है । जिसमे हजारो श्रद्धालु स्नान करते है । जिस के चारो ओर संगमरमर की परिक्रमा बनी हुई है । इस सरोवर की गहराई 12 फुट है । सरोवर से पानी निकालने और ताजा पानी अंदर लाने के लिए एक हँसली बनी हुई है । गुरुद्वारा साहिब के आस पास आमों के बाग है । यहाँ पर हर महीने की अमावस्या को मेला लगता है । जिस मे दूर दूर से श्रद्धालु आते है , यहाँ बड़ा भारी मेला लगता है । अमावस्या पर लंगर पकाने की सेवा आस पास के सिक्ख और माताएँ बहने करती है ।
लंगर के लिए बहुत बड़े बड़े हाल है । जहां एक समय मे हजारो की तादाद मे छकते है । इसके अलावा लंगर मे गैस भटिओ का इंतजाम है । संगतों के रात ठहरने के लिए करीब 120 कमरे बने हुए है सभी कमरो मे चारपाई और बिस्तर भी है पंखे लगे हुए है । अब चपाती बनाने के लिए मशीन लगी हुई है ।
गुरु ग्रंथ साहिब जी के सुख आसन के लिए संचखण्ड हाल बना हुआ है । जिसको परदेश के श्रद्धालुओ ने बनवाया है । साथ ही लंगर हाल की इमारत सरोवर की परिक्रमा और कालेज की इमारत विद्यार्थियो के रहने के लिए कमरे भी परदेश की संगतों द्वारा ही बनवाए जा रहे है ।
शहीद नगर गुरुद्वारा साहिब बूढ़ा जोहड़ मे दो विद्यालय चल रहे है । एक सुखा सिंह भाई महिताब सिंह विद्यालय है जिस मे करीब एक सौ बच्चे है । जिनके रहने सहने लिए लंगर पानी साबुन तेल आदि का खर्च लिखाई , पढ़ाई का खर्च शहीद नगर गुरुद्वारा साहिब बूढ़ा जोहड़ ट्रस्ट द्वारा किया जाता है । इसके अलावा एक सिक्ख मिशनरी कालेज भी चल रहा है जिस मे करीब 90 विद्यार्थी है । जिनको संगीत विद्या दी जाती है । गुरुद्वारा ट्रस्ट की तरफ से विद्यार्थियो की और प्रोफेसरो के रहने खाने पीने लंगर आदि की व्यवस्था की जाती है । कालेज और विद्यालय के बच्चो को वजीफा भी दिया जाता है । स्कूल और कालेज के किसी बच्चे से किसी प्रकार का कोई चार्ज नहीं लिया जाता है । सब कुछ निशुल्क है वजीफा अलग अलग से दिया जाता है । इस स्कूल और कालेज के सेकड़ों बच्चे देश विदेश मे ग्रंथी और रागी की भूमिका निभा रहे है ।
इस शहीद नगर बूढ़ा जोहड़ के प्रबंध के लिए संत फतेह सिंह द्वारा एक ट्रस्ट बना दिया था जिस के 13 मेम्बर है ।

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