Visit to Daman


It was a God sent opportunity to visit Daman. Daman was a Portugues settlement and remained even under the control of Portugal till late when it was annexed by India as a Union Territory. Daman has few beaches but beach sand is now of balcony floor due to the pollution brought in by the Daman Ganga river to sea while passing through Vapi industrial Area. The beaches are dotted with numerous resorts where people from neighbouring state rush to during the weekend for drinks and food as Gujarat is a dry state.

The churches inside the old fort dates back to 1906 when Portuguese initially came to Daman and started building them. The one church is unique in the sense with explicit wood carvings showing the life of lady Mary. Initially all these wood carvings were covered with golden leaf work.

Here are few pics

                  

Gurudwara Sahib Budha Johad: Shri Ganganagar


Grudwara Sahib, Budha Johar in Shri Ganganagar district is sacred place. As per the history told by the Granthi in Gurudwara, this place played a sacred role in giving shelter to Sikh fighter against the atrocities of inavaders during the 17th Century. Bhai Balaka Singh,brought the bad news of the occupation of Harminder Sahib by Massa Rangad Singh. Massa Rangad Singh used the sacred place inappropriate pruposes which led to the journey of Mahitab Singh and Sukha Singh to Harminder Sahib. They cut the head of Massa Rangad and brought it to this place. This place has been named after Jathedaar Budha Singh who stayed here.

Below are some photographs depicting this part of history available in the Museum at the Gurudwara.
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The following is the reproduction of the pamphlet regarding the history of Gurudwara Budha Johar Sahib being distributed in the Gurudwara itself-
यह स्थान राजस्थान प्रांत के जिला श्रीगंगानगर की रायसिंहनगर तहसील के गाँव डाबला के कोई एक किलोमीटर की दूरी पर करनी जी नहर के किनारे पर है। शहीद नगर गुरुद्वारा बूढ़ा जोहड़ के साथ सिख इतिहास का संबंध 17 वी शताब्दी की शुरुआत से जुड़ता है i बूढ़ा जोहड़ का अर्थ है पुराना छपर यहा 20 मुरब्बे नीची जगह है जहा बरसात के मोसम मे कई मिलो तक का पानी नीचे की तरफ चलता हुआ इकट्ठा हो जाता हैi
बाबा बंदा सिंह बहादुर की शहादत के बाद मुगल हुकूमत ने पंजाब के सिखों पर जुल्म जबर की हद कर दी फुर्खसिअर बादशाह ने हुकुम जारी किया कि जहा भी कोई सिख मिले उसे कत्ल कर दोi सिखो के सिरों की कीमत डालने लगीi उस जुल्म जबर के दोर मे हुकूमत ने सिखो को पंजाब से अपने घर बार छोडकर दूर दराज के इलाको पर जाने के लिए मजबूर कर दियाi
सन 1731 ई॰ मे नादर शाह ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया यहा से बेशुमार दौलत लूटी और पंजाब से होते हुए अफगनिसथान को लॉट रहा था सिखो ने उस के काफिलो पर हमले कर के बहुत सारा माल और बहुत सारी नोजवान लड़कियो को उन के काफिलो से मुक्त करवाकर उन के घर वापिस पहुंचाया। नादर शाह इस बात से बहुत क्रोधित हुआ और जक्रिया खान को सिखो का नामो निशान मिटाने का हुकम दिया सिखो के विरूध लाहोर से जकरिया खान ने को सिखो का नामो निशान मिटाने का हुकम दिया। सिखो के विरुद्ध लाहोर से जकरिया खान ने फोज भेजी माझे से नवाब जकरियाखान से सताए हुये दुआबे से आदिन बेग फोजदार जालंदर मालवे से सूबा सरहद के जुल्मो का शिकार हुये सिख विपदा के समय अपने घर बार छोड़ के राजस्थान की बीकानेर रियासत के मरुस्थल वीरान जंगल मे आ गये इस जगह पर पानी काफी तादाद मे था यहा पर ही डेरे लगा लिए क्यूकि जकारिया खान ने सिखो के खात्मा के लिये अमृतसर के चोधरिया और सरकारी मुखबीनों को सिखो के विरुद्ध पूरी तरह तेयार किया हुआ था जदयाले गुरु के हरी भगत नीरजनिए मंडियाली का मस्सा रगर, करमा छीना, रामा रंधावा, नोशहरे वाले जोध नगरिया मजीठा के चोधरिया ने इस काम मे सरकार की पूरी मदद कीi
इस जुल्म के दोर मे सिखो की एक ज्त्थेदारी ने शहीद नगर गुरुद्वारा बूढ़ा जोहड़ वाले इस स्थान को अपनी रिहायशगह बनाया हुआ था उस समय यह स्थान बिलकुल उजाड़ जंगल बियावन था जिसमे जहरीले सापो की भयानक फूंकरो का शोर रहता था i
सन 1740 ई० मे इस स्थान पर सिखो के एक के जत्थे ने जत्थेदार बूढ़ा सिंहजी जेत्थेदारी मे डेरा लगाया था उस समय भाई बलाका सिंह नाम के सिख ने डेरा लगाया हुआ था उस समय भाई बलाका सिंह नाम डीएस सिक्ख ने खबर दी कि सिखों के पंजाब छोडने के बाद मांडयाली गाँव के मस्सा रंगड़ ने श्री हरमंदिर साहिब पर कब्जा कर लिया है वहाँ शराब के दौर चलते है कंजरियों के नाच होते है गुरु घर की घोर बेअदबी हो रही है ।
भाई बलाका सिंह से दुखदायी खबर सुन के इकट्ठे हुए सारे सिख जोश मे आ गए समय की नजाकत को देखते हुए जत्थेदार बुढ़ा सिंह की इच्छा और हाजिर के फैसले अनुसार दो सुरमे महिताब सिंह मीरा कोट और सूखा सिंह माड़ी कंबोकी ने श्री हरमदिर साहिब अमृतसर की पवित्रता को बहाल करने का बीड़ा उठाया और मस्सा रंगड़ का सिर काट कर बुढ़ा जोहड़ लाने के लिए अरदास की। अरदास के बाद दोनों सूरवीर घोड़ो पर सवार हो कर अमृतसर को चल दिये ।
इतिहास मे ज़िकर मिलता है ये दोनों सुरमे बुढ़ा जोहड़ से चलकर श्रीदमदमा साहिब तलवंडी साहिब पहुंचे और अपनी सफलता की अरदास के लिए दमदमा साहिब मे हाजिर हुए तो उस समय दशम पातशाह की बाणी के बारे मे विवाद चल रहा था । सिक्खो का एक समूह दशम पातशाह की बाणी को अलग अलग पोथियों मे रहने देना चाहते थे । सूखा सिंह और महिताब सिंह की अरदास के समय यह फ़ैसला हुआ कि अगर सूखा सिंह और महिताब सिंह दुष्ट मस्सा रंगड़ का सिर काट कर उसका सिर सही सलामत बुढ़ा जोहड़वापिस पहुँच जाते है तो दशम पातशाह की सारी बाणी को एक जिल्द मे एकत्रित कर दशम पातशाह का स्वरूप तैयार किया जाएगा अगर वो इस कम मे सफल न हो सके तो दशम पातशाह की बाणी को अलग अलग पोथियों मे ही रहने दिया जाएगा । गुरु की मेहर का सदका भाई महिताब सिंह और सूखा सिंह अपने उद्देश्य मे सफल हो गए मस्सा रंगड़ का सिर काट कर बुढ़ा जोहड़ लाया गया इस तरह दशम पातशाह कि बाणी के बारे मे छिड़े विवाद का अंत हुआ ।
भाई सूखा सिंह महिताब सिंह ने तरंतारण के नजदीक पहुँच कर चौधरियों के वेश बना लिए अपने गाँव का मामला भरने के बहाने से ठीकरियों को कि थैलियो मे भर ली जब दोनों सिक्ख अमृतसर पहुंचे तो पहले ही तैयार योजना अनुसार उन्होने घोड़े अकाल बुंगे के सामने इलायची बेरी से बांध दिये और अरदास कर के दोनों सुरमे हरमंदिर साहिब पहुंचे तो मस्सा रंगड़ अपनी लुच्च मंडली के साथ हरमंदिर साहिब मे खाट पर बैठा हुक्का पी रहा था । कंजरिया नाच रही थी और शराब का दौर चल रहा थे । जब उसको कहा गया कि चौधरी मामला भरने आए है तो उन्हे थैलिया पेश करने का हुकम दिया थैलिया पेश होने पर मस्सा रंगड़ उठ कर उन्हे देखने लगा तो भाई महिताब सिंह ने फुर्ती से अपने श्री साहिब का वार कर उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया सूखा सिंह ने पलक झपकते ही मस्सा रंगड़ के कटे सिर को अपने भाले पर टांग लिया वहाँ अफरा तफरी मच गई वहाँ इकटठा सारी लुच्च मंडली भाग गई दोनों सुरमे भाले पर टंगे सिर को लेकर फुर्ती से अपने अपने घोड़ो पर सवार होकर अमृतसर की सीमा को पार कर गए ये दोनों सुरमे अपनी की हुई अरदास को पूरा करते हुए वापिस बुढ़ा जोहड़ को चल दिये रात हनुमानगढ़ शहर के पास काटी यहाँ से चल कर सूखा सिंह और महिताब सिंह बुढ़ा जोहड़ बाबा बुढ़ा सिंह के जत्थो के सिक्खो के पास आ पहुंचे और मस्सा रंगड़ का कटा हुआ सिर वहाँ एकत्रित खालसा दल के दीवान मे पेश किया इस कार्य की सफलता के लिए शुक़राने की अरदास की गई ।
कुछ समय बाद महिताब सिंह जी बुढ़ा जोहड़ से वापिस अमृतसर जाते समय किसी मुखबिर की सूचना पर पकड़े गए और लाहौर मे बहुत तसीहें देकर शहीद कर दिए गए।
स. बंदासिंह बहादर की शहादत के बाद 17वीं सदी की शुरुआत मे मुगल हकूमत के ज़ुलम जबर से बचने के लिए और विपदा का समय टालने के लिए दल खालसा के सिख इस बूढ़ा जोहड़ के स्थान पर कुछ समय के लिए आ गए जिस कारण इस स्थान का सिख इतिहास मे महत्वपूरण संबंध है । जत्थेदार बुढ़ा सिंह के नाम पर इस स्थान का नाम बुढ़ा जोहड़ रखा गया । सन 1947 तक बुढ़ा जोहड़ की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया पंजाबी आबादी की गिनती काफी हो गई सारा इलाका और हरा भरा हो गया ।
शहीद नगर गुरुद्वारा साहिब बुढ़ा जोहड़ की नीव सन 1953 मे संत फतह सिंह जी द्वारा रखी गई कुछ कच्चे मकान और पानी की डिग्गी 1954 मे बनाई गई गुरुद्वारे और लंगर का खर्चा चलाने के लिए 2 मुरब्बे जमीन खरीदी गई ।
27 फरवरी 1956 को गुरुद्वारा साहिब की पक्की ईमारत का कम शुरू हुआ इस काम मे हरनाम सिंह ठेकेदार ने बहुत योगदान दिया । इलाके के श्र श्रदालुओ ने अपने ट्रैकटर , ईंटों , सीमेंट और हाथो से सेवा करके अधिक सा अधिक योगदान दिया । गुरुद्वारा साहिब के मेन हाल की लंबाई चौड़ाई तकरीबन 124×99 है । हाल मे एक ही समय मे हजारो की तादाद मे श्रद्धालुओ के बैठने का खुला प्रबंध है । इस के अलावा एक बहुत बड़ा दीवान हाल है । जिस मे अमावस्या पर दीवान लगता है गुरुद्वारा साहिब के अंदर निर्मल जल का एक सुंदर सरोवर है । जिसमे हजारो श्रद्धालु स्नान करते है । जिस के चारो ओर संगमरमर की परिक्रमा बनी हुई है । इस सरोवर की गहराई 12 फुट है । सरोवर से पानी निकालने और ताजा पानी अंदर लाने के लिए एक हँसली बनी हुई है । गुरुद्वारा साहिब के आस पास आमों के बाग है । यहाँ पर हर महीने की अमावस्या को मेला लगता है । जिस मे दूर दूर से श्रद्धालु आते है , यहाँ बड़ा भारी मेला लगता है । अमावस्या पर लंगर पकाने की सेवा आस पास के सिक्ख और माताएँ बहने करती है ।
लंगर के लिए बहुत बड़े बड़े हाल है । जहां एक समय मे हजारो की तादाद मे छकते है । इसके अलावा लंगर मे गैस भटिओ का इंतजाम है । संगतों के रात ठहरने के लिए करीब 120 कमरे बने हुए है सभी कमरो मे चारपाई और बिस्तर भी है पंखे लगे हुए है । अब चपाती बनाने के लिए मशीन लगी हुई है ।
गुरु ग्रंथ साहिब जी के सुख आसन के लिए संचखण्ड हाल बना हुआ है । जिसको परदेश के श्रद्धालुओ ने बनवाया है । साथ ही लंगर हाल की इमारत सरोवर की परिक्रमा और कालेज की इमारत विद्यार्थियो के रहने के लिए कमरे भी परदेश की संगतों द्वारा ही बनवाए जा रहे है ।
शहीद नगर गुरुद्वारा साहिब बूढ़ा जोहड़ मे दो विद्यालय चल रहे है । एक सुखा सिंह भाई महिताब सिंह विद्यालय है जिस मे करीब एक सौ बच्चे है । जिनके रहने सहने लिए लंगर पानी साबुन तेल आदि का खर्च लिखाई , पढ़ाई का खर्च शहीद नगर गुरुद्वारा साहिब बूढ़ा जोहड़ ट्रस्ट द्वारा किया जाता है । इसके अलावा एक सिक्ख मिशनरी कालेज भी चल रहा है जिस मे करीब 90 विद्यार्थी है । जिनको संगीत विद्या दी जाती है । गुरुद्वारा ट्रस्ट की तरफ से विद्यार्थियो की और प्रोफेसरो के रहने खाने पीने लंगर आदि की व्यवस्था की जाती है । कालेज और विद्यालय के बच्चो को वजीफा भी दिया जाता है । स्कूल और कालेज के किसी बच्चे से किसी प्रकार का कोई चार्ज नहीं लिया जाता है । सब कुछ निशुल्क है वजीफा अलग अलग से दिया जाता है । इस स्कूल और कालेज के सेकड़ों बच्चे देश विदेश मे ग्रंथी और रागी की भूमिका निभा रहे है ।
इस शहीद नगर बूढ़ा जोहड़ के प्रबंध के लिए संत फतेह सिंह द्वारा एक ट्रस्ट बना दिया था जिस के 13 मेम्बर है ।

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Wall paintings of Orchcha Palace , Near Jhansi


The lively wall and ceiling paintings have been used by the kings of Orchcha to decorate the Rajmahal. These paintings are around 400-500 old. though paintings are quite old, yet these are very colorful and still shines too lot. The paintings reflects the unique style and this school of painting came up along with other regional schools of paintings. This school of miniature painting is referred as bundela school of paintings.

The entrance of Rajmahal welcomes you with the detailed ceiling of carpet like paintings and walls decorated with the flowers and birds. The rooms of the palace are decorated with the scenes from the Ramayana and Mahabharata. some painting depicts the role of queens and scenes from the battle.

Here are the few pics-
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Prithvinath Temple & Jhali dham, Pachran – Gonda


It was told by the priest of the temple that this temple is around 6500 old. There was a devil (rakhshas) called VAKASUR in this region. He was supplied with one bull and one human being everyday for food by the people. The bull was usually arranged by the king of this region and human being volunteered themselves for the same. it is said that Pandavas came to this place during their vanvaas and stayed here for sometime.

One day Mata Kunti was passing through this place, when she found that one lady was crying with tears in her eyes. She inquired the reason for the same. Lady told that she has the only one son and same is going to be offered to Vakasur for the food. When Kunti knew about it, she told don’t worry, since you have only one son and i have five, i will send one of my son in place of your son.

Prithvinath Shiv Temple, Gonda

When she returned back and told the same to his sons, Bhima agreed to go. When Bhima reached the place he challanged Vakasur and consequently there was a fierce fight between the Vakasur and Bhima. T the end Bhima killed vakasur and people in this region started living with peace and prosperity.

But this Ssur was Brahmin Asur, thus the Bhima was blamed for the Brahm-Hatya. To repent the same he did penance here and established the largest Shivling of the world at this place. The temple is preserved by the Archaeological Survey of India. It is located around 40 KM from Gonda.

Largest Shivling in World


Kamdhenu Gaya

At the Jhalidham, there is a kandhenu gaya. It is believed that kamdhenu gaya is always here and gives milk throughout the year without going through the normal cycle of breeding.

Chhapia: Birthplace of Swaminarayan (Saint Sahjanand)


Chapia is situated at a distance of 50 Km from Gonda.Chhapia is famous for the temple of Swami Narain,which lie in 1.5 Km. south from the Railway station of Chhapia.

Chhapia Temple

The temple has been constructed at the birthplace of Sami Sahjanand. Saint was the son of an Pandey .Saint was born in 1780. At a very early age the boy then known as Sahjanand migrated to Gujrat, where he was adopted by Ramanand, heading great Vaishnav monastery at Junagarh. He became a noted Sanskrit scholar and gained a wide reputation for learning .

After his death at the age of 49 he was accorded divine honours by his devotees as an incarnation of Lord Krishna under the name of Swami Narain.His immense wealth passed to his two uncle who went from Chhapia to Gujrat.In about 1845 his disciples in Gujrat determined to erect a temple at Chhapia and a number of them came to Chhapia for this purpose.After annexation the place was of the enormous sum of Rs 500 per acre and the building adjoining the temple were completed.

Now a second temple is being constructed at the birthplace.

Following is the text available on Chhapia.com

In this land known as ‘Bharat’, during Kaliyuj, the evil and arson ruled the society creating tyranny and distrust amongst people. While the rulers were busy in their political conflicts, the people suffered economically, socially and religiously.

In a congregation of Maryadik Rushi Uddavji Dharmadev and Bhaktimata at Badrikashram under the auspices of Bhagwan Narnarayan Dev a concern was shown about the situation on the earth. Rushi Durwasa from the ranges of mountain Kailash came there and shunned all present that as they have insulted him therefore shall take on to the human form and suffer at the hands of evil.

Whereupon Dharma Dev and Bhakti mata politely calmed the Rushi and whereupon declaring the irreversibility of the showing of Rushi Durvasa clerified that Dharma Dev will be born to Bhakti mata in a Brahmin family and will release all of them and will also protect them against the evil.

Narayan Rushi clarified that this was due to his wishes and that He will be born as a saviour of religion and shall eradicate the evil. Thus an era began with the birth of Ghanshyam – who had taken births in various forms to eradicate the evil and protect the religion, in s.s. 1837 on ninth day of chitra. There are legends argociated with the child hood at Chappiya in Maknapur Taluka of Gonda District, at a distance of 40 k.m. from Ayodhya, one of the nine ancient legendary places of the sub continent.

The later childhood of the Bhagwan was spent at Ayodhya on migration due to harassment of evils doers, where he learnt various disciplines and arts in vedas, puranas, Shrimad Bhagwat. yaynavalkya smruti, vishnu puran and Maha Bharat, taking out the gist of all major connotations compiled an abridged version came to be known as “Siksha parti”. Ghanshyam Maharaj taught other boys also and practied what He preached – ” Vidya (education) attained by self should be taught to others too.”

Thus, Bhagwan Swaminarayan’s legends are associated both with Chhapaiya and Ayodhya. Considering the celebration of the “Prayasan Varsh 2006″ and linking the two important places of a unique sect of the subcontinent will facilitate millions of followers to visit the place.

There are legends associated with places like Birth Place, Gangajal well, Narayan Sarovar, Dharmadev Bhaktimata Oata, Kalidatt Oata, Three cornered filed, Min Sarovar, Bhutio (ghost) well, jira bhari Talao. Jambu tree, Moksh pipal, Khapa Jalavdi, Kalyan sagar, Gay ghat, Shravan talavdi, Makhoda ghat, Ram sagar etc. It is the sacred wish of the followers of the sect to visit these places once in life time.

Every year from every part of the globle, the pilgrims visit the place, Which suffers basic infrastructure facilities like proper roads and rail connection, means of communication, helipad, water and drainage connection, lodging and boarding facilities etc.

Every year, on Kartaki purnima and chaitra pumima. (Full moon days of the months of Kartika and chaitra) a fair is organized, visited by lakhs of people from distant places. The temporary stalls cover a periphery of 5 K.m.

The temple is spread out in 20 Acres of land and has facilities to accommodate 25,000 pilgrims at any given time, which would be inadequate, considering, the celebration of 2006 as Tourist year.

Khajuraho: One of seven wonders of India


About Kahjuraho:-

The name Khajuraho is derived from the Sanskrit words kharjura = date palm and vāhaka = “one who carries”. In the 19th century Mr T.S. Burt arrived in the area, followed by General Alexander Cunningham. Cunningham  explored the site on behalf of the Archaeological Survey of India and described what he found in glowing terms. The Khajuraho Monument has been listed as a UNESCO World Heritage Site, and is considered to be one of the “seven wonders” of India.

Why construction of Temple Complex Started?

The creators of Khajuraho claimed their descent from the moon. The legend that describes the origin of this great dynasty is a fascinating one. Hemavati, the beautiful daughter of a Brahmin priest was seduced by the moon god while bathing in the Rati one evening. The child born out of this union of mortal and a god was a son, Chandravarman.

Harassed by society, the unwed mother sought refuge in the dense forest of Central India where she was both mother and guru to her young son. The boy grew up to found the great Chandela dynasty. When Chandravarman became ruler, his mother visited him in dream and directed him to consruct a temple which will reveal human passion and in the process of revealing those passions human being will realize the futility of materialism. Thus King  Chandravarman started constructing the first temple and successors added more, and site evolved into a temple complex.

Groups of Temple and building material:

The Kahjuraho temple comlex has been grouped into three geographical devisions-

1: East Complex

2: West Complex

3: South Complex

These temples are made of sandstone. Without using mortar builder put together slabs of stones and joined them with mortise and tenon joints and they were held in place by gravity. This form of construction requires very precise joints. The columns and architraves were built with megaliths that weighed up to 20 tons.

Sculptors of the Temple:

The Khajuraho temples do not contain sexual or erotic art inside the temple or near the deities; however, some external carvings bear erotic art. Also, some of the temples that have two layers of walls have small erotic carvings on the outside of the inner wall. There are many interpretations of the erotic carvings. They portray that, for seeing the deity, one must leave his or her sexual desires outside the temple. They also show that divinity, such as the deities of the temples, is pure like the atman, which is not affected by sexual desires and other characteristics of the physical body. It has been suggested that these suggest tantric sexual practices. Meanwhile, the external curvature and carvings of the temples depict humans, human bodies, and the changes that occur in human bodies, as well as facts of life. Some 10% of the carvings contain sexual themes; those reportedly do not show deities, they show sexual activities between people. The rest depict the everyday life of the common Indian of the time when the carvings were made, and of various activities of other beings. For example, those depictions show women putting on makeup, musicians, potters, farmers, and other folk. Those mundane scenes are all at some distance from the temple deities. A common misconception is that, since the old structures with carvings in Khajuraho are temples, the carvings depict sex between deities.

Another perspective of these carvings is presented by James McConnachie. In his history of the Kamasutra, McConnachie describes the zesty 10% of the Khajuraho sculpture as “the apogee of erotic art”: “Twisting, broad-hipped and high breasted nymphs display their generously contoured and bejewelled bodies on exquisitely worked exterior wall panels. These fleshy apsaras run riot across the surface of the stone, putting on make-up, washing their hair, playing games, dancing, and endlessly knotting and unknotting their girdles….Beside the heavenly nymphs are serried ranks of griffins, guardian deities and, most notoriously, extravagantly interlocked maithunas, or lovemaking couples.”

While the sexual nature of these carvings have caused the site to be referred to as the Kamasutra temple, they do not illustrate the meticulously described positions. Neither do they express the philosophy of Vatsyayana’s famous sutra. As “a strange union of Tantrism and fertility motifs, with a heavy dose of magic” they belie a document which focuses on pleasure rather than procreation. That is, fertility is moot.

The strategically placed sculptures are “symbolical-magical diagrams, or yantras” designed to appease malevolent spirits. This alamkara (ornamentation) expresses sophisticated artistic transcendence over the natural; sexual images imply a virile, thus powerful, ruler.

Between 950 and 1150, the Chandela monarchs built these temples when the Tantric tradition may have been accepted. In olden days, before the Mughal conquests, when boys lived in hermitages, following brahmacharya until they became men, they could learn about the world and prepare themselves to become householders through examining these sculptures and the worldly desires they depicted.

While recording the television show ‘lost worlds’ for the history channel at Khajuraho Alex Evans, a contemporary stonemason and sculptor gave his expert opinion and forensically examined the tool marks and construction techniques involved in creating the stunning stonework at the sites. He also recreated a stone sculpture under 4 feet that took about 60 days to carve in an attempt to develop a rough idea how much work must have been involved. Roger Hopkins and Mark Lehner also conducted experiments to quarry limestone which took 12 quarrymen 22 days to quarry about 400 tons of stone. These temples would have required hundreds of highly trained sculptors.

Rio de Janeiro, 11th january 2012, Cristo and Copacabana